श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.284.27 
देव्युवाच
सुप्राकृतोऽपि पुरुष: सर्व: स्त्रीजनसंसदि।
स्तौति गर्वायते चापि स्वमात्मानं न संशय:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
देवी बोलीं - नाथ! यदि कोई पुरुष अत्यन्त अशिक्षित भी हो, तो भी वह प्रायः समस्त स्त्रियों के सामने अपनी ही प्रशंसा के गीत गाता है और अपनी श्रेष्ठता का अभिमान करता है - इसमें तनिक भी संदेह नहीं है॥ 27॥
 
The Goddess said - Nath! Even if a man is extremely uneducated, he sings songs of his own praise in front of almost all the women and takes pride in his superiority - there is no doubt about it at all.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)