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mahabharat 12.284.25: परन्तु मैं सब कुछ जानता हूँ। विशाललोचने! जिनका मन एकाग्र नहीं है, वे दुष्ट और अधर्मी मनुष्य मेरे वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते। आज तुम्हारी माया के कारण इन्द्र आदि देवताओं सहित तीनों लोक असमंजस में पड़ गए हैं कि क्या करें॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.284.25 
अहं विजानामि विशालनेत्रे
ध्यानेन हीना न विदन्त्यसन्त:।
तवाद्य मोहेन च सेन्द्रदेवा
लोकास्त्रय: सर्वत एव मूढा:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
परन्तु मैं सब कुछ जानता हूँ। विशाललोचने! जिनका मन एकाग्र नहीं है, वे दुष्ट और अधर्मी मनुष्य मेरे वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते। आज तुम्हारी माया के कारण इन्द्र आदि देवताओं सहित तीनों लोक असमंजस में पड़ गए हैं कि क्या करें॥ 25॥
 
'But I know everything. Vishallochane! Those whose mind is not focused, those wicked and unrighteous people do not know my true nature. Today, due to your delusion, the three worlds including Indra and other gods have become confused about what to do.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)