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mahabharat 12.284.21: दधीचि बोले, "मैं जानता हूँ कि यह निर्णय आप सबने मिलकर लिया है। इसीलिए महादेवजी को आमंत्रित नहीं किया गया है; किन्तु मैं भगवान शंकर से बढ़कर किसी अन्य देवता को नहीं देखता। यदि यह सत्य है तो प्रजापति दक्ष का यह विशाल यज्ञ अवश्य ही नष्ट हो जायेगा।"   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.284.21 
दधीचिरुवाच
सर्वेषामेव मन्त्रोऽयं येनासौ न निमन्त्रित:।
यथाह शंकरादूर्ध्वं नान्यं पश्यामि दैवतम्।
तथा दक्षस्य विपुलो यज्ञोऽयं न भविष्यति॥ २१॥
 
 
अनुवाद
दधीचि बोले, "मैं जानता हूँ कि यह निर्णय आप सबने मिलकर लिया है। इसीलिए महादेवजी को आमंत्रित नहीं किया गया है; किन्तु मैं भगवान शंकर से बढ़कर किसी अन्य देवता को नहीं देखता। यदि यह सत्य है तो प्रजापति दक्ष का यह विशाल यज्ञ अवश्य ही नष्ट हो जायेगा।"
 
Dadhichi said, "I know that this decision has been taken by all of you together. That is why Mahadevji has not been invited; but I do not see any other deity greater than Lord Shankar. If this is true then this huge yagya of Prajapati Daksha will definitely be destroyed."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)