श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 200
 
 
श्लोक  12.284.200 
मनसा चिन्तितं यच्च यच्च वाचानुकीर्तितम्।
सर्वं सम्पद्यते तस्य स्तवस्यास्यानुकीर्तनात्॥ २००॥
 
 
अनुवाद
वह मन में जो कुछ भी चिन्तन करता है अथवा वाणी से जो कुछ भी प्रार्थना करता है, इस स्तोत्र का बार-बार पाठ करने से उसकी सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥200॥
 
Whatever he contemplates about in his mind or whatever he prays for with his words, all his desires are fulfilled by repeatedly reciting this hymn. ॥200॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)