श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 196
 
 
श्लोक  12.284.196 
अनेनैव तु देहेन गणानां समतां व्रजेत्।
तेजसा यशसा चैव युक्तो भवति निर्मल:॥ १९६॥
 
 
अनुवाद
इतना ही नहीं, इसी शरीर में वह भगवान शिव के अनुयायियों के समान हो जाता है और पवित्र, तेज और यश से युक्त हो जाता है ॥196॥
 
Not only this, in this very body he achieves equality with Lord Shiva's followers and becomes pure, filled with brilliance and fame.॥ 196॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)