श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 195
 
 
श्लोक  12.284.195 
व्याधितो दु:खितो दीनश्चोरग्रस्तो भयार्दित:।
राजकार्याभियुक्तो वा मुच्यते महतो भयात्॥ १९५॥
 
 
अनुवाद
रोगी, दुःखी, दीन-हीन, चोर के वश में, भयभीत, सरकारी मुकदमे में अपराधी, यहाँ तक कि इस स्तोत्र के पाठ से महान भय से मुक्ति मिलती है।
 
A sick person, a sad person, a downtrodden person, a thief in whose hands, a frightened person or a criminal in a government's case, even a person gets relief from the great fear by reciting this hymn. 195.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)