श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 186
 
 
श्लोक  12.284.186 
भूयश्च ते वरं दद्मि तं त्वं गृह्णीष्व सुव्रत।
प्रसन्नवदनो भूत्वा तदिहैकमना: शृणु॥ १८६॥
 
 
अनुवाद
सुव्रत! मैं तुम्हें पुनः वर दे रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार करो और प्रसन्न मुख तथा एकाग्र मन से मेरी बात सुनो।' 186.
 
'Suvrata! I am again granting you a boon. Please accept it and listen to me here with a happy face and a focused mind.' 186.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)