श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 182
 
 
श्लोक  12.284.182 
परितुष्टोऽस्मि ते दक्ष स्तवेनानेन सुव्रत।
बहुनात्र किमुक्तेन मत्समीपे भविष्यसि॥ १८२॥
 
 
अनुवाद
हे उत्तम व्रतों को करने वाले दक्ष! मैं आपकी इस स्तुति से बहुत संतुष्ट हूँ। मैं यहाँ और क्या कहूँ, आप मेरे समीप ही रहेंगे॥182॥
 
'O Daksh, the one who performs the best vows, I am very satisfied with this praise by you. What more can I say here, you will live near me.॥ 182॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)