श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 180
 
 
श्लोक  12.284.180 
प्रसीद मम भद्रं ते भव भावगतस्य मे।
त्वयि मे हृदयं देव त्वयि बुद्धिर्मनस्त्वयि॥ १८०॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! आपकी कृपा हो। मैं भक्तिपूर्वक आपके पास आया हूँ, अतः आप मुझ पर प्रसन्न हों। मेरा हृदय, मेरी बुद्धि और मेरा मन, ये सब आपको समर्पित हैं ॥180॥
 
O Lord! May you be blessed. I have come to you with devotion, so please be pleased with me. My heart, my intellect and my mind are all dedicated to you. ॥180॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)