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mahabharat 12.284.176: जिनकी संख्या, रूप और स्वरूप अनन्त हैं और जिनके गुणों की गणना नहीं की जा सकती, उन रुद्रों को मैं सदैव नमस्कार करता हूँ ॥176॥   |   mahabharat अध्याय 12.284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 176
 
 
श्लोक  12.284.176 
येषां न विद्यते संख्या प्रमाणं रूपमेव च।
असंख्येयगुणा रुद्रा नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यश:॥ १७६॥
 
 
अनुवाद
जिनकी संख्या, रूप और स्वरूप अनन्त हैं और जिनके गुणों की गणना नहीं की जा सकती, उन रुद्रों को मैं सदैव नमस्कार करता हूँ ॥176॥
 
I always salute those Rudras whose number, form and form are limitless and whose qualities cannot be counted. ॥176॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)