श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 172-175
 
 
श्लोक  12.284.172-175 
ये नदीषु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च।
वृक्षमूलेषु गोष्ठेषु कान्तारे गहनेषु च॥ १७२॥
चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु तटेषु च।
हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोद्यानालयेषु च॥ १७३॥
येषु पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च।
चन्द्रार्कयोर्मध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु॥ १७४॥
रसातलगता ये च ये च तस्मै परं गता:।
नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यश:॥ १७५॥
 
 
अनुवाद
नदी, समुद्र, पर्वत, गुफाएँ, वृक्षों की जड़ें, गौशालाएँ, दुर्गम मार्ग, वन, चौराहे, सड़कें, चबूतरे, तट, हाथियों के अस्तबल, घोड़ों के अस्तबल, रथों के अस्तबल, पुराने बगीचे, जीर्ण-शीर्ण मकान, पाँचों भूत, दिशाएँ, उपदिशाएँ, चन्द्रमा, सूर्य और उनकी किरणें, रसातल और उससे भिन्न जो भी स्थान अधिष्ठात्री देवताओं के रूप में स्थित हैं, उनको मैं सदैव नमस्कार करता हूँ, उनको नमस्कार करता हूँ, उनको नमस्कार करता हूँ ॥172-175॥
 
River, sea, mountain, caves, roots of trees, cow-sheds, inaccessible paths, forests, crossroads, roads, platforms, banks, elephant stables, horse stables, chariot stables, old gardens, dilapidated houses, the five elements, directions, sub-directions, the Moon, the Sun and their rays, the abyss and the places other than that which are present as the presiding deities, I always salute them, I salute them, I salute them. ॥172-175॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)