श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 165
 
 
श्लोक  12.284.165 
जटिले दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे।
कमण्डलुनिषङ्गाय तस्मै ब्रह्मात्मने नम:॥ १६५॥
 
 
अनुवाद
जो ब्रह्माजी के रूप में स्थित हैं, जो सदैव जटा और दण्ड धारण करते हैं, जिनका पेट और शरीर विशाल है और जिनके लिए कमण्डलु तरकस का काम करता है, उन भगवान शिव को नमस्कार है ॥165॥
 
Salutations to Lord Shiva who is present in the form of Lord Brahma, who always wears matted hair and a staff, whose stomach and body are huge and for whom Kamandalu acts as a quiver. 165॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)