श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 163
 
 
श्लोक  12.284.163 
य: सहस्राण्यनेकानि पुंसामावृत्य दुर्दृश:।
तिष्ठत्येक: समुद्रान्ते स मे गोप्तास्तु नित्यश:॥ १६३॥
 
 
अनुवाद
जो हजारों लोगों पर माया का आवरण डाले हुए हैं, जो सबके लिए अगम्य हैं, जो अतुलनीय हैं और जो समस्त कामनाओं के क्षीण हो जाने पर समुद्र के समान प्रकाश में प्रकट होते हैं, वे परमेश्वर मेरी सदैव रक्षा करें॥163॥
 
May the Supreme Lord, who casts a veil of illusion over thousands of people and is incomprehensible to all, who is incomparable and who, like the ocean, emerges in light when all desires are exhausted, always protect me. ॥163॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)