श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 162
 
 
श्लोक  12.284.162 
रक्ष मां रक्षणीयोऽहं तवानघ नमोऽस्तु ते।
भक्तानुकम्पी भगवान् भक्तश्चाहं सदा त्वयि॥ १६२॥
 
 
अनुवाद
अनघ! मैं आपकी रक्षा के योग्य हूँ, कृपया मेरी रक्षा करें, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप भक्तों पर दया करने वाले प्रभु हैं और मैं आपका सदा भक्त हूँ॥162॥
 
Anagha! I am worthy of being protected by you, please protect me, I bow before you. You are the Lord who shows mercy to his devotees and I am your devotee forever.॥ 162॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)