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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  12.284.16-17 
तस्माद् देशादपक्रम्य दधीचिर्वाक्यमब्रवीत्॥ १६॥
अपूज्यपूजनाच्चैव पूज्यानां चाप्यपूजनात्।
नृघातकसमं पापं शश्वत् प्राप्नोति मानव:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
यह स्मरण होते ही दधीचि यज्ञस्थल छोड़कर दूर चले गए और बोले - 'सज्जनों! पूजनीय महापुरुष की पूजा न करके, अपूज्य पुरुष की पूजा करके मनुष्य सदैव हत्या के समान पाप को प्राप्त होता है॥ 16-17॥
 
As soon as Dadhichi remembered this, he left the place where the sacrifice was being held and went far away and said, 'Gentlemen! By worshipping an unworshipable person and not worshipping a great man who is worthy of worship, a man always incurs the same sin as murder.॥ 16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)