श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 156
 
 
श्लोक  12.284.156 
अमृतपास्त्वं जगन्नाथ देवदेव गणेश्वर:।
विषाग्निपा मृत्युपाश्च क्षीरपा: सोमपास्तथा।
मधुश्च्युतानामग्रपास्त्वमेव तुषिताद्यपा:॥ १५६॥
 
 
अनुवाद
हे देवों के स्वामी! जगन्नाथ! आप अमृत के पान करने वाले और अपने अनुयायियों के स्वामी हैं। आप विष और मृत्यु से रक्षा करते हैं तथा दूध और सोम का रस पीते हैं। आप भोग से भ्रष्ट हुए जीवों के प्रधान रक्षक हैं और तुषित नामक देवताओं के मूल, ब्रह्माजी के भी रक्षक हैं। 156।
 
O lord of gods! Jagannath! You are the drinker of nectar and the lord of your followers. You protect against poison and death and drink milk and Som juice. You are the chief protector of the living beings corrupted by pleasure and also the protector of Brahmaji, the origin of the gods named Tusita. 156.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)