श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 145-146
 
 
श्लोक  12.284.145-146 
धाता विधाता संधाता विधाता धारणोऽधर:।
ब्रह्मा तपश्च सत्यं च ब्रह्मचर्यमथार्जवम्॥ १४५॥
भूतात्मा भूतकृद्भूतो भूतभव्यभवोद्भव:।
भूर्भुव: स्वरितश्चैव ध्रुवो दान्तो महेश्वर:॥ १४६॥
 
 
अनुवाद
धाता (धारण करने वाला), विधाता (सृजन करने वाला), संधाता (जोड़ने वाला), विधाता (पालन करने वाला) और अधर (आधारहीन) भी आपके ही नाम हैं। आप ब्रह्म, तप, सत्य, ब्रह्मचर्य, आर्जव (सरलता), भूतात्मा (प्राणियों की आत्मा), भूतों के रचयिता, भूत (शाश्वत), भूत, भविष्य और वर्तमान की उत्पत्ति के कारण, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, ध्रुव (स्थिर), दन्त (दमनीय) और महेश्वर हैं। 145-146॥
 
Dhata (one who holds), Vidhaata (one who creates), Sandhaata (one who joins), Vidhaata (one who sustains) and Adhar (baseless) are also your names. You are Brahma, penance, truth, celibacy, Arjava (simplicity), Bhootatma (soul of beings), creator of ghosts, Bhoota (eternal), cause of origin of past, future and present, Bhurlok, Bhuvarlok, Swarlok, Dhruva (stable), Dant (suppressible) and Maheshwar. 145-146॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)