श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 138
 
 
श्लोक  12.284.138 
मत्स्यो जलचरो जाल्योऽकल: केलिकल: कलि:।
अकालश्चातिकालश्च दुष्काल: काल एव च॥ १३८॥
 
 
अनुवाद
आप मछली हैं, जलचर हैं और जालधारी मगरमच्छ भी हैं। फिर भी आप ज्ञान के बंधन से परे हैं। आप काम से युक्त हैं और कलह का स्वरूप हैं। आप दुर्भिक्ष, अतिकाल, विपत्तिकाल और स्वयं काल भी हैं॥138॥
 
You are a fish, aquatic animal and a crocodile with a net. Yet you are beyond the bondage of wisdom. You are filled with passion and are the form of quarrels. You are the famine, the excessive time, the bad time and time itself.॥138॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)