श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  12.284.130 
आदिश्चान्तश्च देवानां गायत्र्योंकार एव च।
हरितो रोहितो नील: कृष्णो रक्तस्तथारुण:।
कद्रुश्च कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा॥ १३०॥
 
 
अनुवाद
देवताओं का आदि और अंत आप ही हैं। गायत्री मंत्र और ओंकार भी आप ही हैं। हरा, लाल, नीला, काला, लाल, लाल, कद्रू, कपिल, कबूतर के समान और मेचक (काले बादल के समान) - ये दस प्रकार के रंग भी आपके ही स्वरूप हैं ॥130॥
 
You are the beginning and the end of the gods. Gayatri Mantra and Omkar are also you. Green, red, blue, black, red, red, kadru, kapil, like a pigeon and Mechak (like a dark cloud) – these ten types of colours are also your form. ॥130॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)