श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  12.284.124 
वृक्षाणां ककुुदोऽसि त्वं गिरीणां शिखराणि च।
व्याघ्रो मृगाणां पततां तार्क्ष्योऽनन्तश्च भोगिनाम्॥ १२४॥
 
 
अनुवाद
वृक्षों में आप प्रधान हैं, बरगद, पीपल आदि वृक्ष आप ही हैं; पर्वतों में आप ही उनके शिखर हैं; वन्य पशुओं में आप ही बाघ हैं; पक्षियों में आप ही गरुड़ हैं; और सर्पों में आप ही अनन्त हैं॥124॥
 
Among trees, you are the chief, the Banyan tree, the Peepal tree etc.; among mountains, you are their peaks, among wild animals, you are the tiger, among birds, Garuda and among snakes, you are the infinite. ॥ 124॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)