श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  12.284.114 
स्थूल जीर्णाङ्ग जटिले वल्कलाजिनधारिणे।
दीप्तसूर्याग्निजटिले वल्कलाजिनवाससे।
सहस्रसूर्यप्रतिम तपोनित्य नमोऽस्तु ते॥ ११४॥
 
 
अनुवाद
आपका स्वरूप विशाल और जीर्ण है। आपके बाल जटाओं से युक्त हैं। आप छाल और मृगचर्म धारण करते हैं। आप जटाओं से सुशोभित हैं जो प्रज्वलित सूर्य और अग्नि के समान चमकते हैं। छाल और मृगचर्म आपके वस्त्र हैं। आप हजारों सूर्यों के समान चमकते हैं और सदैव तपस्या में लीन रहते हैं। आपको नमस्कार है ॥114॥
 
Your form is bulky and worn out. You have matted hair. You wear bark and deerskin. You are adorned with matted hair that glows like the blazing sun and fire. Bark and deerskin are your clothes. You shine like thousands of suns and are always engaged in penance. Salutations to you. ॥114॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)