श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  12.284.110 
नमो रथ्यविरथ्याय चतुष्पथरथाय च।
कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
आप रथ पर बैठकर भी विचरण करते हैं और बिना रथ के भी। आप जल, अग्नि, वायु और आकाश - चारों मार्गों पर विचरण करते हैं। आप काले मृगचर्म को दुपट्टे की तरह धारण करते हैं और सर्प का जनेऊ धारण करते हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥110॥
 
You move around sitting on a chariot and also without a chariot. You move on all four paths - water, fire, air and sky. You wear black deerskin as a scarf and wear a sacred thread made of a snake. I salute you.॥110॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)