श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  12.284.105 
बालानुचरगोप्ताय बालक्रीडनकाय च।
नमो वृद्धाय लुब्धाय क्षुब्धाय क्षोभणाय च॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण के रूप में आप बालकों के सखा और रक्षक हैं तथा उनके साथ क्रीड़ा करते हैं। आप अन्य सभी से बड़े हैं। आप भक्ति और प्रेम के लोभी हैं। दुष्टों के पापों से आप व्याकुल हो जाते हैं और दुष्टों को क्रोधित करते हैं। आपको नमस्कार है॥105॥
 
In the form of Shri Krishna, you are the companion of children and the protector of children and play with them. You are older than all others. You are greedy for devotion and love. You get agitated by the sins of the wicked and you infuriate the wicked. Salutations to you.॥105॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)