श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  12.284.103 
अन्नदायान्नपतये नमस्त्वन्नभुजे तथा।
नम: सहस्रशीर्षाय सहस्रचरणाय च॥ १०३॥
 
 
अनुवाद
आप अन्नदाता, अन्न के स्वामी और अन्न के भोक्ता हैं। आपके हजारों सिर और हजारों चरण हैं। मैं आपको बार-बार प्रणाम करता हूँ॥103॥
 
You are the giver of food, the lord of food and the consumer of food. You have thousands of heads and thousands of feet. I bow to you again and again.॥103॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)