श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 284: पार्वतीके रोष एवं खेदका निवारण करनेके लिये भगवान् शिवके द्वारा दक्षयज्ञका विध्वंस, दक्षद्वारा किये हुए शिवसहस्रनामस्तोत्रसे संतुष्ट होकर महादेवजीका उन्हें वरदान देना तथा इस स्तोत्रकी महिमा  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  12.284.100 
हूंहूंहूंकारपाराय हूंहूंकारप्रियाय च।
नम: शमशमे नित्यं गिरिवृक्षालयाय च॥ १००॥
 
 
अनुवाद
आप क्रोध, गर्जना, आकाश, सूर्य और देव से परे स्थित परम ब्रह्म हैं। आपको 'हूँ, हूँ' और 'हूँ' कहना प्रिय है। आप 'शान्त रहो, शान्त रहो' कहकर सबको सदैव आश्वासन देते हैं तथा आप पर्वतों पर तथा वृक्षों के नीचे निवास करते हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥100॥
 
You are the Supreme Brahma who exists beyond anger, roar, and sky, the sun and God. You like to say 'am, am' and 'am'. You always give assurance to everyone by saying 'be calm, be calm' and you reside on the mountains and under the trees. I salute you.॥100॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)