श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.283.54 
रन्ध्रागतमथाश्वानां शिखोद्भेदश्च बर्हिणाम्।
नेत्ररोग: कोकिलस्य ज्वर: प्रोक्तो महात्मना॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
घोड़ों के गले में जो मांस का लोथड़ा निकलता है, वह उनका ज्वर है। मोरों की जो कलगी निकलती है, वह उनका ज्वर है। महात्मा शिव ने कोयल के नेत्ररोग को भी ज्वर कहा है ॥54॥
 
The lump of flesh that grows in the throat of horses is their fever. The crest of peacocks growing out is their fever. Mahatma Shiva has also called the eye disease of cuckoos as fever. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)