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mahabharat 12.283.48: प्रभु! जब तक आपका यह तेजरूपी ज्वर एक ही रूप में रहेगा, तब तक यह सम्पूर्ण पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकेगी। अतः आप इसे अनेक रूपों में विभाजित कर दीजिए॥48॥   |   mahabharat अध्याय 12.283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.283.48 
एकीभूतस्य न त्वस्य धारणे तेजस: प्रभो।
समर्था सकला पृथ्वी बहुधा सृज्यतामयम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
प्रभु! जब तक आपका यह तेजरूपी ज्वर एक ही रूप में रहेगा, तब तक यह सम्पूर्ण पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकेगी। अतः आप इसे अनेक रूपों में विभाजित कर दीजिए॥48॥
 
Prabhu! As long as this fever of your radiance remains in one form, this entire earth will not be able to bear it. Therefore, please divide it into many forms. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)