श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.283.43 
तेन तस्मिन् विचरता पुरुषेण विशाम्पते।
पृथिवी ह्यचलद् राजन्नतीव भरतर्षभ॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! हे भारतभूषण! हे प्रजानाथ! उस यज्ञ में विचरण करते हुए उस पुरुष के पैरों की ध्वनि से पृथ्वी जोर-जोर से काँपने लगी।
 
O King! O Bharatbhushan! O Prajanath! The earth began to tremble violently at the sound of the feet of that man while he was moving about in that yajna. 43.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)