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mahabharat 12.283.34-35h: कुछ दरबारी, जिनके चेहरे डरावने थे, बलि की सामग्री उखाड़कर उस स्थान के चारों ओर चक्कर लगाने लगे। कुछ अन्य लोग बलि की सामग्री को अपने मुँह से खा गए।   |   mahabharat अध्याय 12.283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  12.283.34-35h 
केचिद् यूपान् समुत्पाटॺ बभ्रमुर्विकृतानना:॥ ३४॥
आस्यैरन्ये चाग्रसन्त तथैव परिचारकान्।
 
 
अनुवाद
कुछ दरबारी, जिनके चेहरे डरावने थे, बलि की सामग्री उखाड़कर उस स्थान के चारों ओर चक्कर लगाने लगे। कुछ अन्य लोग बलि की सामग्री को अपने मुँह से खा गए।
 
Some of the courtiers with terrifying faces uprooted the sacrificial offerings and began circling around the place. Others devoured the attendants of the sacrificial offering with their mouths. 34 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)