vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप
»
श्लोक 3
श्लोक
12.283.3
कथमेष महाप्राज्ञ ज्वर: प्रादुर्बभौ कुत:।
ज्वरोत्पत्तिं निपुणत: श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो॥ ३॥
अनुवाद
हे महापुरुष! हे प्रभु! यह ज्वर कैसे और कहाँ से उत्पन्न हुआ? मैं ज्वर की उत्पत्ति की कथा विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥3॥
O great man! O Lord! How and where did this fever originate from? I wish to hear the story of the origin of the fever in detail. ॥ 3॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×