श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.283.3 
कथमेष महाप्राज्ञ ज्वर: प्रादुर्बभौ कुत:।
ज्वरोत्पत्तिं निपुणत: श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे महापुरुष! हे प्रभु! यह ज्वर कैसे और कहाँ से उत्पन्न हुआ? मैं ज्वर की उत्पत्ति की कथा विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ॥3॥
 
O great man! O Lord! How and where did this fever originate from? I wish to hear the story of the origin of the fever in detail. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)