vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप
»
श्लोक 23
श्लोक
12.283.23
भगवन् क्व नु यान्त्येते देवा: शक्रपुरोगमा:।
ब्रूहि तत्त्वेन तत्त्वज्ञ संशयो मे महानयम्॥ २३॥
अनुवाद
हे प्रभु! ये इन्द्र आदि देवता कहाँ जा रहे हैं? तत्त्वज्ञ परमेश्वर! मुझे ठीक-ठीक बताइए। मेरे मन में यह बड़ा संदेह उत्पन्न हो गया है॥23॥
'Lord! Where are these gods like Indra going? Tattvajna Parmeshwar! Tell me exactly. This big doubt has arisen in my mind.'॥ 23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×