Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.283.14-15: महाराज! महादेवजी के अनुयायी अनेक रूप धारण करने वाले भूत-प्रेत, अत्यन्त भयंकर राक्षस, अत्यन्त बलवान मनुष्य और अनेक रूप धारण करने वाले भूत-प्रेत, हर्ष में भरे हुए तथा नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए वहाँ खड़े रहते थे। वे सब अग्नि के समान तेजस्वी थे। | mahabharat अध्याय 12.283: शिवजीद्वारा दक्षयज्ञका भंग और उनके क्रोधसे ज्वरकी उत्पत्ति तथा उसके विविध रूप । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
भूतानि च महाराज नानारूपधराण्यथ।
राक्षसाश्च महारौद्रा: पिशाचाश्च महाबला:॥ १४॥
बहुरूपधरा हृष्टा नानाप्रहरणोद्यता:।
देवस्यानुचरास्तत्र तस्थिरे चानलोपमा:॥ १५॥
अनुवाद
महाराज! महादेवजी के अनुयायी अनेक रूप धारण करने वाले भूत-प्रेत, अत्यन्त भयंकर राक्षस, अत्यन्त बलवान मनुष्य और अनेक रूप धारण करने वाले भूत-प्रेत, हर्ष में भरे हुए तथा नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए वहाँ खड़े रहते थे। वे सब अग्नि के समान तेजस्वी थे।
Maharaj! Ghosts taking many forms, extremely fearsome demons, extremely powerful men and ghosts taking many forms, who were followers of Mahadevji, used to stand there filled with joy and carrying various types of weapons. All of them were as radiant as fire.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥