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श्लोक 12.282.65  |
इत्येतद् वृत्रमाश्रित्य शक्रस्यात्यद्भुतं महत्।
कथितं कर्म ते तात किं भूय: श्रोतुमिच्छसि॥ ६५॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रिये! इस प्रकार मैंने वृत्रासुर के प्रसंग में इन्द्र की अद्भुत कथा तुमसे कही। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?॥ 65॥ |
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| O dear! In this way, I have narrated to you the wonderful story of Indra in the context of Vritraasura. What else do you wish to hear now?॥ 65॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि ब्रह्महत्याविभागे द्वॺशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २८२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें ब्रह्महत्याका विभाजनविषयक दो सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८२॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६६ श्लोक हैं) |
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