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mahabharat 12.282.64: जो प्रत्येक पर्व के दिन ब्राह्मणों की सभा में इस दिव्य कथा को सुनाता है, उसे किसी भी प्रकार का पाप नहीं लगता ॥ 64॥   |   mahabharat अध्याय 12.282: वृत्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 282: वृत्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  12.282.64 
ये तु शक्रकथां दिव्यामिमां पर्वसु पर्वसु।
विप्रमध्ये वदिष्यन्ति न ते प्राप्स्यन्ति किल्बिषम्॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
जो प्रत्येक पर्व के दिन ब्राह्मणों की सभा में इस दिव्य कथा को सुनाता है, उसे किसी भी प्रकार का पाप नहीं लगता ॥ 64॥
 
He who narrates this divine story in the assembly of Brahmins on every festival day will not commit any kind of sin. ॥ 64॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)