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mahabharat 12.282.51: ब्रह्माजी ने कहा, "वृत्रासुर का वध करने से इन्द्र को ब्रह्महत्या का यह भयंकर पाप प्राप्त हुआ है। तुम सब इसका एक-चौथाई भाग ग्रहण करो।" ॥51॥   |   mahabharat अध्याय 12.282: वृत्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 282: वृत्रासुरका वध और उससे प्रकट हुई ब्रह्महत्याका ब्रह्माजीके द्वारा चार स्थानोंमें विभाजन  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  12.282.51 
ब्रह्मोवाच
इयं वृत्रादनुप्राप्ता पुरुहूतं महाभया।
ब्रह्मवध्या चतुर्थांशमस्या यूयं प्रतीच्छत॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी ने कहा, "वृत्रासुर का वध करने से इन्द्र को ब्रह्महत्या का यह भयंकर पाप प्राप्त हुआ है। तुम सब इसका एक-चौथाई भाग ग्रहण करो।" ॥51॥
 
Brahma said, "By killing Vritraasura, Indra has received this dreadful sin of killing a brahmin. You all can accept one fourth of it." ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)