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श्लोक 12.281.44  |
रथस्थस्य हि शक्रस्य युद्धकाले महात्मन:।
ऋषिभि: स्तूयमानस्य रूपमासीत् सुदुर्दृशम्॥ ४४॥ |
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| अनुवाद |
| युद्ध के समय जब वे रथ पर बैठे हुए ऋषियों द्वारा अपनी स्तुति सुनते थे, तब महाबली इन्द्र का रूप ऐसा तेजस्वी दिखाई देता था कि उसकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन हो जाता था ॥ 44॥ |
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| During the war, while sitting on the chariot and listening to the sages singing his praises, the great Indra's form appeared so radiant that it was extremely difficult to even look at him. ॥ 44॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वृत्रवधे एकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २८१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वृत्रासुरका वधविषयक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८१॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुछ ४४ १/२ श्लोक हैं) |
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