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mahabharat 12.280.63: जो प्रलयकाल में भी विद्यमान रहते हैं, वे परम शक्तिशाली और सबके स्वामी भगवान श्री हरि, कल्पान्त में जल के भीतर शयन करते हैं और वे प्रसन्नचित्त आत्मा सृष्टिकर्ता परमेश्वर उन समस्त अनन्त लोकों में विचरण करते हैं॥63॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  12.280.63 
अर्वाक् स्थितस्तु य: स्थायी कल्पान्ते परिवर्तते।
स शेते भगवानप्सु योऽसावतिबल: प्रभु:।
तान् विधाता प्रसन्नात्मा लोकांश्चरति शाश्वतान्॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
जो प्रलयकाल में भी विद्यमान रहते हैं, वे परम शक्तिशाली और सबके स्वामी भगवान श्री हरि, कल्पान्त में जल के भीतर शयन करते हैं और वे प्रसन्नचित्त आत्मा सृष्टिकर्ता परमेश्वर उन समस्त अनन्त लोकों में विचरण करते हैं॥63॥
 
The latter Sanatan Narayan who is present even in the doomsday, that very powerful and supreme Lord of all, Lord Shri Hari, sleeps inside the water in Kalpant and that happy soul creator God roams in all those eternal worlds. 63॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)