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mahabharat 12.280.54: जब तक शुद्ध भावों से युक्त सिद्ध पुरुष इस पाँच इन्द्रिय रूपी करणों के समूह को वश में करके शेष प्रारब्ध कर्मों का भोग करता है, तब तक उसके शरीर में समस्त लोक अर्थात् इन्द्रियों के देवता तथा अपरा और परा विद्याएँ निवास करती हैं ॥54॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  12.280.54 
स यावदेवास्ति सशेषभुक् ते
प्रजाश्च देव्यौ च तथैव शुक्ले।
तावत् तदङ्गेषु विशुद्धभाव:
संयम्य पञ्चेन्द्रियरूपमेतत्॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
जब तक शुद्ध भावों से युक्त सिद्ध पुरुष इस पाँच इन्द्रिय रूपी करणों के समूह को वश में करके शेष प्रारब्ध कर्मों का भोग करता है, तब तक उसके शरीर में समस्त लोक अर्थात् इन्द्रियों के देवता तथा अपरा और परा विद्याएँ निवास करती हैं ॥54॥
 
'As long as a perfect man, full of pure feelings, controls this group of Karans in the form of five senses and enjoys the remaining destiny karma, till then all the people, i.e. the gods of the senses and the Apara and Para Vidya reside in his body. 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)