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mahabharat 12.280.47: यदि कोई योगी भी, जो छठे (शुक्ल) वर्ण के साधक को प्राप्त होने वाले परम मोक्ष को प्राप्त करने के अधिकार से वंचित हो गया है और जिसके सभी पाप नष्ट हो गए हैं, योगजनित धन को भोगने की इच्छा को त्यागने में असमर्थ है, तो वह न चाहने पर भी, अपनी साधना के फलस्वरूप महर, जन, तप और सत्य नामक चारों लोकों में एक कल्प तक निवास करता है (और कल्प के अंत में मुक्त हो जाता है)॥47॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.280.47 
संहारविक्षेपमनिष्टमेकं
चत्वारि चान्यानि वसत्यनीश:।
षष्ठस्य वर्णस्य परा गतिर्या
सिद्धावसिद्धस्य गतक्लमस्य॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई योगी भी, जो छठे (शुक्ल) वर्ण के साधक को प्राप्त होने वाले परम मोक्ष को प्राप्त करने के अधिकार से वंचित हो गया है और जिसके सभी पाप नष्ट हो गए हैं, योगजनित धन को भोगने की इच्छा को त्यागने में असमर्थ है, तो वह न चाहने पर भी, अपनी साधना के फलस्वरूप महर, जन, तप और सत्य नामक चारों लोकों में एक कल्प तक निवास करता है (और कल्प के अंत में मुक्त हो जाता है)॥47॥
 
'If even a yogi who has lost the right to attain the ultimate salvation, which is attained by a devotee of the sixth (Shukla) caste, and whose all sins have been destroyed, is unable to give up the desire to enjoy the wealth generated by yoga, then even if he does not wish to, he dwells in the four worlds, namely Mahar, Jan, Tapa and Satya, as a result of his sadhana, for a kalpa (and becomes free at the end of the kalpa).॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)