Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.280.45: वह जीव क्रमशः रक्तवर्ण (सुखद देवता), हरिद्रवर्ण (देवता) और शुक्लवर्ण (सनकादिकुमारों के समान उत्तम शरीर वाला) होकर क्रमशः सात सौ दिव्य शरीरों का आश्रय लेकर पृथ्वी आदि सात उत्तम लोकों में विचरण करता हुआ पूर्व पुण्य के प्रभाव से शीघ्र ही शुद्ध ब्रह्मलोक को चला जाता है ॥45॥ | mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
दैवानि स व्यूहशतानि सप्त
रक्तो हरिद्रोऽथ तथैव शुक्ल:।
संश्रित्य संधावति शुक्लमेत-
मष्टावरानर्च्यतमान् स लोकान्॥ ४५॥
अनुवाद
वह जीव क्रमशः रक्तवर्ण (सुखद देवता), हरिद्रवर्ण (देवता) और शुक्लवर्ण (सनकादिकुमारों के समान उत्तम शरीर वाला) होकर क्रमशः सात सौ दिव्य शरीरों का आश्रय लेकर पृथ्वी आदि सात उत्तम लोकों में विचरण करता हुआ पूर्व पुण्य के प्रभाव से शीघ्र ही शुद्ध ब्रह्मलोक को चला जाता है ॥45॥
'Becoming respectively Raktavarna (pleasant deity), Haridravarna (deity) and Shuklavarna (having a perfect body like Sanakadikumars), that living being, after taking shelter of seven hundred divine bodies one by one, wandering in the seven best worlds like earth and the like, rapidly goes to the pure Brahmalok due to the influence of previous virtue. 45॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥