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mahabharat 12.280.44: ‘राक्षसों के मुखिया! वह जीवात्मा समय-समय पर अशुभ कर्म करता हुआ कभी-कभी इस मृत्युलोक से भी नीचे गिर जाता है और पृथ्वी के सबसे निचले लोक के समान सबसे नीची, काले रंग की (स्थिर) योनि में जन्म लेता है। मैं तुम्हें वह उपाय बता रहा हूँ जिससे यह जीवात्माओं का समूह उत्थान-पतन के चक्र में फँसा हुआ मोक्ष प्राप्त करता है॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.280.44 
सोऽस्मादथ भ्रश्यति कालयोगात्
कृष्णे तले तिष्ठति सर्वकृष्टे।
यथा त्वयं सिद्धॺति जीवलोक-
स्तत् तेऽभिधास्याम्यसुरप्रवीर॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
‘राक्षसों के मुखिया! वह जीवात्मा समय-समय पर अशुभ कर्म करता हुआ कभी-कभी इस मृत्युलोक से भी नीचे गिर जाता है और पृथ्वी के सबसे निचले लोक के समान सबसे नीची, काले रंग की (स्थिर) योनि में जन्म लेता है। मैं तुम्हें वह उपाय बता रहा हूँ जिससे यह जीवात्माओं का समूह उत्थान-पतन के चक्र में फँसा हुआ मोक्ष प्राप्त करता है॥ 44॥
 
‘Head of the demons! By committing inauspicious deeds over a period of time, that soul sometimes falls even below the mortal world and is born in the lowest, black-coloured (immobile) form of the lowest, like the lowest region of the earth. I am telling you the way in which this group of souls, caught in the cycle of rise and fall, attains salvation.॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)