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mahabharat 12.280.40: तत्पश्चात् जब वह धीरे-धीरे अपनी तपस्या को बढ़ाता है, एक कल्प तक मनुष्य लोक में स्वधर्म के बंधनों से बँधकर कष्टों को सहता है, तब उसे हल्दी के समान पीत वर्ण वाला देवत्व प्राप्त होता है। वहाँ भी सैकड़ों कल्प व्यतीत करने के पश्चात् पुण्य का क्षय होने पर वह पुनः मनुष्य बन जाता है (इस प्रकार वह देव से मानव और मानव से देव बनता रहता है)।   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.280.40 
स तत्र संहारविसर्गमेकं
स्वधर्मजैर्बन्धनै: क्लिश्यमान:।
तत: स हारिद्रमुपैति वर्णं
संहारविक्षेपशते व्यतीते॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् जब वह धीरे-धीरे अपनी तपस्या को बढ़ाता है, एक कल्प तक मनुष्य लोक में स्वधर्म के बंधनों से बँधकर कष्टों को सहता है, तब उसे हल्दी के समान पीत वर्ण वाला देवत्व प्राप्त होता है। वहाँ भी सैकड़ों कल्प व्यतीत करने के पश्चात् पुण्य का क्षय होने पर वह पुनः मनुष्य बन जाता है (इस प्रकार वह देव से मानव और मानव से देव बनता रहता है)।
 
'After that, when he gradually increases his penance, being bound by the bonds of self-righteousness in the human world for a Kalpa and suffering the hardships, then he attains the feeling of divinity, having a yellow complexion like that of turmeric. There too, after spending hundreds of Kalpas, he again becomes a human being after the loss of virtue (thus he keeps changing from a god to a human and from a human to a god).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)