श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.280.39 
स वै यदा सत्त्वगुणेन युक्त-
स्तमो व्यपोहन् घटते स्वबुद्धॺा।
स लोहितं वर्णमुपैति नीलान्
मनुष्यलोके परिवर्तते च॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
जब वही जीव सत्त्वगुण से परिपूर्ण होता है, तब अपनी बुद्धि के द्वारा तमोगुण की वृत्तियों को हटाकर अपने कल्याण का प्रयत्न करता है। उस समय जब सत्त्वगुण की वृद्धि होती है, तब वह रक्तवर्ण का हो जाता है (इसे अनुग्रह सर्ग कहते हैं, मन की विविध वृत्तियों पर अनुग्रह करने वाले विशेष ईश्वर का नाम 'अनुग्रह' है)। जब सत्त्वगुण में कुछ न्यूनता आ जाती है, तब वह जीव नीले रंग का हो जाता है और मनुष्य लोक में भ्रमण करने लगता है। 39॥
 
'When the same living being is filled with Sattva Guna, then through his intellect he removes the tendencies of Tamo Guna and tries for his welfare. At that time, when the Sattva Guna increases, it becomes blood colored (this is called Anugrah Sarga, the name of the special God who bestows grace on various tendencies of the mind is 'Anugrah'). When there is some deficiency in Sattva Guna, then that living being acquires blue color and starts traveling in the human world. 39॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas