Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.280.38: तत्पश्चात् वह जीव लाखों बार (या लाखों वर्षों तक) नरक में भटकता है और फिर धुएँ के समान रंग को प्राप्त होता है (पशु, पक्षी आदि योनियों में जन्म लेता है)। उस योनि में भी वह असहाय होता है और महान दुःखों से युक्त रहता है। फिर आयु समाप्त होने पर तप (प्राचीन पुण्य या विवेक) के प्रभाव से उसका उद्धार होता है और उस संकट से मुक्ति मिलती है॥ 38॥ | mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तत्पश्चात् वह जीव लाखों बार (या लाखों वर्षों तक) नरक में भटकता है और फिर धुएँ के समान रंग को प्राप्त होता है (पशु, पक्षी आदि योनियों में जन्म लेता है)। उस योनि में भी वह असहाय होता है और महान दुःखों से युक्त रहता है। फिर आयु समाप्त होने पर तप (प्राचीन पुण्य या विवेक) के प्रभाव से उसका उद्धार होता है और उस संकट से मुक्ति मिलती है॥ 38॥
‘After that the soul wanders in hell for lakhs of times (or for lakhs of years) and then gets the colour of smoke (takes birth in the form of animal, bird etc.). In that form also he is helpless and lives with great misery. Then when the age ends, he is saved by the effect of penance (ancient good deeds or prudence) and gets salvation from that crisis.॥ 38॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥