Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.280.36: दैत्यप्रवर! इस संसार में सम्पूर्ण जीव समुदाय की संख्या चौदह लाख कही गई है। (पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - ये चौदह करण हैं। इनके भेद से चौदह प्रकार की गतियाँ होती हैं। फिर वृत्तियों और विषयों के भेद से चौदह लाख प्रकार की गतियाँ होती हैं।) जीव की ऊर्ध्व लोकों में गति भी उन्हीं चौदह करणों द्वारा होती है। उन जीवों का भिन्न-भिन्न स्थानों में स्थिर निवास और उन स्थानों से उनकी अवनति भी उनके सम्बन्ध के कारण ही होती है। इसे आप भली-भाँति जान लें (अतः इन चौदह कारणों को सात्त्विक मार्ग की ओर उन्मुख करें)। 36॥ | mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
शतं सहस्राणि चतुर्दशेह
परागतिर्जीवगणस्य दैत्य।
आरोहणं तत्कृतमेव विद्धि
स्थानं तथा नि:सरणं च तेषाम्॥ ३६॥
अनुवाद
दैत्यप्रवर! इस संसार में सम्पूर्ण जीव समुदाय की संख्या चौदह लाख कही गई है। (पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार - ये चौदह करण हैं। इनके भेद से चौदह प्रकार की गतियाँ होती हैं। फिर वृत्तियों और विषयों के भेद से चौदह लाख प्रकार की गतियाँ होती हैं।) जीव की ऊर्ध्व लोकों में गति भी उन्हीं चौदह करणों द्वारा होती है। उन जीवों का भिन्न-भिन्न स्थानों में स्थिर निवास और उन स्थानों से उनकी अवनति भी उनके सम्बन्ध के कारण ही होती है। इसे आप भली-भाँति जान लें (अतः इन चौदह कारणों को सात्त्विक मार्ग की ओर उन्मुख करें)। 36॥
‘Daityapravar! The population of the entire living community in this world is said to be fourteen lakhs. (Five action organs, five knowledge organs and mind, intellect, chitta and ego - these are the fourteen karanas. Due to their difference, there are fourteen types of movements. Then, due to the difference of instincts from subject matter, there are fourteen lakh types of movements.) The movement of the living being in the upper worlds is also done by the same fourteen karanas. The stable residence in different places and the degeneration of those living beings from those places is also due to their relationship. You should know this very well (therefore these fourteen reasons should be oriented towards the Sattvik path). 36॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥