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mahabharat 12.280.35: असुरेन्द्र! शुभ दर्शन प्राप्त होने पर देवराज इन्द्र ने जो गति और दर्शन बताया है, वही गति वर्ण से उत्पन्न जीवों की है, अर्थात् गौर वर्ण वाले मनुष्यों को भी वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। वह वर्ण अप्रचलित माना गया है। 35॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.280.35 
गतिं च यां दर्शनमाह देवो
गत्वा शुभं दर्शनमेव चापि।
गति: पुनर्वर्णकृता प्रजानां
वर्णस्तथा कालकृतोऽसुरेन्द्र॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
असुरेन्द्र! शुभ दर्शन प्राप्त होने पर देवराज इन्द्र ने जो गति और दर्शन बताया है, वही गति वर्ण से उत्पन्न जीवों की है, अर्थात् गौर वर्ण वाले मनुष्यों को भी वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। वह वर्ण अप्रचलित माना गया है। 35॥
 
'Asurendra! The speed and philosophy which Devraj Indra has described to us after attaining the auspicious philosophy is the speed of living beings born out of color, that is, the people with fair complexion get the same success. That character is considered obsolete. 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)