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श्लोक 12.280.34  |
परं तु शुक्लं विमलं विशोकं
गतक्लमं सिद्धॺति दानवेन्द्र।
गत्वा तु योनिप्रभवाणि दैत्य
सहस्रश: सिद्धिमुपैति जीव:॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| दैत्यराज! श्वेत रंग निर्मल, शोकरहित और प्रयत्नरहित है, अतः सिद्धि देने वाला है। दितिकुलपुत्र! हजारों योनियों में जन्म लेने के बाद जीवात्मा मनुष्य योनि में आकर ही सिद्धि प्राप्त करता है॥ 34॥ |
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| 'Demon King! The white colour is pure, devoid of sorrow and without any effort, hence it is a provider of success. Son of Ditikul! After taking birth in thousands of species, a soul attains success only after coming to human species. ॥ 34॥ |
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