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mahabharat 12.280.31-32: वे सभी बावड़ियाँ पाँच सौ योजन चौड़ी, पाँच सौ योजन लम्बी और एक कोस गहरी होनी चाहिए। गहराई इतनी होनी चाहिए कि कोई उनमें प्रवेश न कर सके। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक बावड़ी बहुत लंबी, चौड़ी और गहरी होनी चाहिए। उनमें से किसी एक बावड़ी का जल दिन में केवल एक बार बाल की नोक से खोदकर निकालना चाहिए, दो बार नहीं। उन सभी बावड़ियों का जल इतने समय में खोदकर निकालना चाहिए कि प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश का चक्र उसी समय समाप्त हो जाए (अर्थात् जिस प्रकार उपरोक्त विधि से खोदकर निकाले जाने के बाद उन बावड़ियों के जल का सूख जाना असंभव है, उसी प्रकार ज्ञान के बिना संसार का विनाश होना भी असंभव है।)   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  12.280.31-32 
वाप्य: पुनर्योजनविस्तृतास्ता:
क्रोशं च गम्भीरतयावगाढा:।
आयामत: पञ्चशताश्च सर्वा:
प्रत्येकशो योजनत: प्रवृद्धा:॥ ३१॥
वाप्या जलं क्षिप्यति वालकोटॺा
त्वह्ना सकृच्चाप्यथ न द्वितीयम्।
तासां क्षये विद्धि परं विसर्गं
संहारमेकं च तथा प्रजानाम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वे सभी बावड़ियाँ पाँच सौ योजन चौड़ी, पाँच सौ योजन लम्बी और एक कोस गहरी होनी चाहिए। गहराई इतनी होनी चाहिए कि कोई उनमें प्रवेश न कर सके। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक बावड़ी बहुत लंबी, चौड़ी और गहरी होनी चाहिए। उनमें से किसी एक बावड़ी का जल दिन में केवल एक बार बाल की नोक से खोदकर निकालना चाहिए, दो बार नहीं। उन सभी बावड़ियों का जल इतने समय में खोदकर निकालना चाहिए कि प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश का चक्र उसी समय समाप्त हो जाए (अर्थात् जिस प्रकार उपरोक्त विधि से खोदकर निकाले जाने के बाद उन बावड़ियों के जल का सूख जाना असंभव है, उसी प्रकार ज्ञान के बिना संसार का विनाश होना भी असंभव है।)
 
‘All those step wells should be five hundred yojanas wide, five hundred yojanas long and one kos deep. The depth should be such that no one can enter them. The meaning is that each step well should be very long, wide and deep. One should scoop out the water of one of those step wells only once in a day with the tip of a hair and not twice. By scooping out the water of all those step wells in such a time that the cycle of creation and destruction of creatures can end in the same time (meaning just as it is impossible for the water of those step wells to dry up after being scooped out in the above manner, similarly it is impossible for the world to be destroyed without knowledge.)
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)