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mahabharat 12.280.26: अनेक जातियाँ और आश्रम उनके आश्रय हैं, उनके अनेक मुख हैं। हृदय पर आश्रित धर्म भी उनका स्वरूप है। वे ब्रह्म हैं। वे आत्म-साक्षात्कार रूप परम धर्म हैं। वे तपस्वरूप हैं, शुभ-अशुभ हैं।॥26॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.280.26 
बह्वाश्रयो बहुमुखो धर्मो हृदि समाश्रित:।
स ब्रह्म परमो धर्मस्तपश्च सदसच्च स:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
अनेक जातियाँ और आश्रम उनके आश्रय हैं, उनके अनेक मुख हैं। हृदय पर आश्रित धर्म भी उनका स्वरूप है। वे ब्रह्म हैं। वे आत्म-साक्षात्कार रूप परम धर्म हैं। वे तपस्वरूप हैं, शुभ-अशुभ हैं।॥26॥
 
‘Many castes and ashrams are His refuge, He has many faces. The religion that is dependent on the heart is also His form. He is the Brahman. He is the ultimate religion in the form of self-realization. He is the form of penance and good and bad.॥ 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)