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mahabharat 12.280.20: वे नाशवान और अविनाशी रूप में समस्त प्राणियों में विद्यमान हैं। ग्यारह इन्द्रियों की वैकारिक सृष्टि भी उन्हीं का स्वरूप है। वे अपनी चेतन किरणों द्वारा सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त हैं॥ 20॥   |   mahabharat अध्याय 12.280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 280: वृत्रासुरको सनत्कुमारका अध्यात्मविषयक उपदेश देना और उसकी परमगति तथा भीष्मद्वारा युधिष्ठिरकी शंकाका निवारण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.280.20 
स वै सर्वेषु भूतेषु क्षरश्चाक्षर एव च।
एकादशविकारात्मा जगत‍् पिबति रश्मिभि:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वे नाशवान और अविनाशी रूप में समस्त प्राणियों में विद्यमान हैं। ग्यारह इन्द्रियों की वैकारिक सृष्टि भी उन्हीं का स्वरूप है। वे अपनी चेतन किरणों द्वारा सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त हैं॥ 20॥
 
‘He is present in all living beings in the form of perishable and imperishable. The Vaikarik* creation of the eleven senses is also His form. He is pervading the entire world through His conscious rays.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)